Friday, 22 July 2016

INDIAN EDUCATION SYSTEM


छठी के छात्र छेदी कुमार ने 6×6= 36 की जगह 32 कहकर जैसे ही बत्तीसी दिखाई , गुरुजी ने छड़ी उठाई और मारने वाले ही थे की छेदी ने कहा , "खबरदार अगर मुझे मारा तो! मे गिनती नही जानता मगर आरटीई की धाराएँ अच्छी तरह जानता हूँ।
गणित मे नही , हिंदी मे समझाना आता है।
गुरुजी चौराहों पर खड़ी मूर्तियों की तरह जड़वत हो गए। जो कल तक बोल नही पाता था,वो आज आँखें दिखा रहा है।
शोरगुल सुनकर प्रधानाध्यापक भी उधर आ धमके, कई दिनों से उनका कार्यालय से निकलना ही नही हुआ था वे हमेशा विवादों से दूर रहना पसंद करते थे, इसी कारण से उन्होंने बच्चों को पढ़ाना भी बंद कर दिया था। आते ही उन्होंने छड़ी को तोड़ कर बाहर फेंका और बोले, सरकार का आदेश नही पढ़ा ? प्रताड़ना का केस दर्ज हो सकता है। रिटायरमेंट नजदीक है , निलंबन की मार पड़ गई तो पेंशन के फजीते पड़ जाएँगे बच्चे न पढ़े न सही , पर प्रेम से पढ़ाओ,उनसे निवेदन करो,अगर कही शिकायत कर दी तो ?
बेचारे गुरुजी पसीने पसीने हो गए मानो हर बूँद-बूँद से प्रायश्चित टपक रहा हो! इधर छेदी "गुरुजी हाय हाय" के नारे लगाता जा रहा था और बाकी बच्चे भी उसके साथ हो लिए।
प्रधानाध्यापक ने छेदी को एक कोने मे ले जाकर कहा, "मुझसे कहो क्या चाहिए ?"
छेदी बोला, "जब तक गुरुजी मुझसे माफी नही माँग लेते है, हम शाला का बहिष्कार करेंगे,बताए की शिकायत पेटी कहाँ है ?"
समस्त स्टाफ आश्चर्यचकित और भय के वातावरण में था । छात्र जान चुके थे की उत्तीर्ण होना उनका कानूनी अधिकार है।
बड़े सर ने छेदी से कहा की में उनकी तरफ से माफी माँगता हूँ, पर छेदी बोला, "आप क्यों मांगोगे ? जिसने किया वही माफी माँगे, मेरा अपमान हुआ है।"
आज गुरुजी के सामने बहुत बड़ा संकट था । जिस छेदी के बाप तक को उन्होंने दंड , दृढ़ता और अनुशासन से पढ़ाया था , आज उनकी ये तीनों शक्तिया छेदी के सामने परास्त हो चुकी थी , वे इतने भयभीत हो चुके थे कि एकांत मे छेदी के पैर तक छूने को तैयार थे , लेकिन सार्वजनिक रूप से गुरूता के ग्राफ को गिराना नही चाहते थे । छड़ी के संग उनका मनोबल ही नही अपितु परंपरा , प्रणाली और मर्यादा भी टूट चुकी थी। सारी व्यवस्था नियम , कानून एक्सपायर हो चुके थे , कानून क्या कहता है, अब ये बच्चो से सीखना पढ़ेगा!
पाठ्यक्रम में अधिकारों का वर्णन था , कर्तव्यों का पता नही था। कि अंतिम पड़ाव पर गुरु द्रोण स्वयं चक्रव्यूह मे फँस जाएँगे!
वे प्रण कर चुके थे की कल से बच्चें जैसा कहेंगे , वैसा ही वे करेंगे , तभी बड़े सर उनके पास आकर बोले , "मे आपको समझ रहा हूँ । वह मान गया है और अंदर आ रहा है , उससे माफी माँग लो , समय की यही जरूरत है।"
छेदी अंदर आकर टेबल पर बैठ गया और हवा के तेज झोंके ने शर्मिन्दा होकर द्वार बंद कर दिए ।
अब मेरी कलम को चाहिए कि वह यहीं थम जाए । कई बार मौन की भाषा संवादों पर भारी पड़ जाती है ।

"सभी सम्मानिये शिक्षक गुरूजी को समर्पित "

Thursday, 14 January 2016

सास बहु की "तू _तू _में _में "

भारत की परम्पराओ और सामाजिक मान्यताओ का नविन विचारधारा के बिच चल रहा एक चर्चित्र गृह युद्ध है “सास –बहु की “तू –तू -में -में l
यंहा दोषी कोन है यह खोजना ही एक चुनोती है l पर क्या कभी आपने एस गृह युद्ध को समझने का प्रयास किया ? शायद किया होगा पर मुझे लगता है यह केवल अहम् और गिरते साम्राज्य और बनती बिरासत की लडाई नही अपितु केवल सोच में परिवर्तन और मानसिकता को ठेस पहुँचाने वाले अहम्  का युद्ध है एक कहानी के माध्यम से में आप लोगो तक यह युद्ध की हकीकत सामने लाने का प्रयास करता हूँ


आरती नामक एक युवती का विवाह हुआ और वह अपने पति और सास के साथ अपने ससुराल में रहने लगी। कुछ ही दिनों बाद आरती को आभास होने लगा कि उसकी सास के साथ पटरी नहीं बैठ रही है। सास पुराने ख़यालों की थी और बहू नए विचारों वाली।
आरती और उसकी सास का आये दिन झगडा होने लगा।
दिन बीते, महीने बीते. साल भी बीत गया. न तो सास टीका-टिप्पणी करना छोड़ती और न आरती जवाब देना। हालात बद से बदतर होने लगे। आरती को अब अपनी सास से पूरी तरह नफरत हो चुकी थी. आरती के लिए उस समय स्थिति और बुरी हो जाती जब उसे भारतीय परम्पराओं के अनुसार दूसरों के सामने अपनी सास को सम्मान देना पड़ता। अब वह किसी भी तरह सास से छुटकारा पाने की सोचने लगी.
एक दिन जब आरती का अपनी सास से झगडा हुआ और पति भी अपनी माँ का पक्ष लेने लगा तो वह नाराज़ होकर मायके चली आई।
आरती के पिता आयुर्वेद के डॉक्टर थे. उसने रो-रो कर अपनी व्यथा पिता को सुनाई और बोली – “आप मुझे कोई जहरीली दवा दे दीजिये जो मैं जाकर उस बुढ़िया को पिला दूँ नहीं तो मैं अब ससुराल नहीं जाऊँगी…”
बेटी का दुःख समझते हुए पिता ने आरती के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा – “बेटी, अगर तुम अपनी सास को ज़हर खिला कर मार दोगी तो तुम्हें पुलिस पकड़ ले जाएगी और साथ ही मुझे भी क्योंकि वो ज़हर मैं तुम्हें दूंगा. इसलिए ऐसा करना ठीक नहीं होगा.”
लेकिन आरती जिद पर अड़ गई – “आपको मुझे ज़हर देना ही होगा ….
अब मैं किसी भी कीमत पर उसका मुँह देखना नहीं चाहती !”
कुछ सोचकर पिता बोले – “ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी। लेकिन मैं तुम्हें जेल जाते हुए भी नहीं देख सकता इसलिए जैसे मैं कहूँ वैसे तुम्हें करना होगा ! मंजूर हो तो बोलो ?”
“क्या करना होगा ?”, आरती ने पूछा.
पिता ने एक पुडिया में ज़हर का पाउडर बाँधकर आरती के हाथ में देते हुए कहा – “तुम्हें इस पुडिया में से सिर्फ एक चुटकी ज़हर रोज़ अपनी सास के भोजन में मिलाना है।
कम मात्रा होने से वह एकदम से नहीं मरेगी बल्कि धीरे-धीरे आंतरिक रूप से कमजोर होकर 5 से 6 महीनों में मर जाएगी. लोग समझेंगे कि वह स्वाभाविक मौत मर गई.”
पिता ने आगे कहा -“लेकिन तुम्हें बेहद सावधान रहना होगा ताकि तुम्हारे पति को बिलकुल भी शक न होने पाए वरना हम दोनों को जेल जाना पड़ेगा ! इसके लिए तुम आज के बाद अपनी सास से बिलकुल भी झगडा नहीं करोगी बल्कि उसकी सेवा करोगी।
यदि वह तुम पर कोई टीका टिप्पणी करती है तो तुम चुपचाप सुन लोगी, बिलकुल भी प्रत्युत्तर नहीं दोगी ! बोलो कर पाओगी ये सब ?”
आरती ने सोचा, छ: महीनों की ही तो बात है, फिर तो छुटकारा मिल ही जाएगा. उसने पिता की बात मान ली और ज़हर की पुडिया लेकर ससुराल चली आई.
ससुराल आते ही अगले ही दिन से आरती ने सास के भोजन में एक चुटकी ज़हर रोजाना मिलाना शुरू कर दिया।
साथ ही उसके प्रति अपना बर्ताव भी बदल लिया. अब वह सास के किसी भी ताने का जवाब नहीं देती बल्कि क्रोध को पीकर मुस्कुराते हुए सुन लेती।
रोज़ उसके पैर दबाती और उसकी हर बात का ख़याल रखती।
सास से पूछ-पूछ कर उसकी पसंद का खाना बनाती, उसकी हर आज्ञा का पालन करती।

कुछ हफ्ते बीतते बीतते सास के स्वभाव में भी परिवर्तन आना शुरू हो गया. बहू की ओर से अपने तानों का प्रत्युत्तर न पाकर उसके ताने अब कम हो चले थे बल्कि वह कभी कभी बहू की सेवा के बदले आशीष भी देने लगी थी।
धीरे-धीरे चार महीने बीत गए. आरती नियमित रूप से सास को रोज़ एक चुटकी ज़हर देती आ रही थी।
किन्तु उस घर का माहौल अब एकदम से बदल चुका था. सास बहू का झगडा पुरानी बात हो चुकी थी. पहले जो सास आरती को गालियाँ देते नहीं थकती थी, अब वही आस-पड़ोस वालों के आगे आरती की तारीफों के पुल बाँधने लगी थी।
बहू को साथ बिठाकर खाना खिलाती और सोने से पहले भी जब तक बहू से चार प्यार भरी बातें न कर ले, उसे नींद नही आती थी।
छठा महीना आते आते आरती को लगने लगा कि उसकी सास उसे बिलकुल अपनी बेटी की तरह मानने लगी हैं। उसे भी अपनी सास में माँ की छवि नज़र आने लगी थी।
जब वह सोचती कि उसके दिए ज़हर से उसकी सास कुछ ही दिनों में मर जाएगी तो वह परेशान हो जाती थी।
इसी ऊहापोह में एक दिन वह अपने पिता के घर दोबारा जा पहुंची और बोली – “पिताजी, मुझे उस ज़हर के असर को ख़त्म करने की दवा दीजिये क्योंकि अब मैं अपनी सास को मारना नहीं चाहती … !
वो बहुत अच्छी हैं और अब मैं उन्हें अपनी माँ की तरह चाहने लगी हूँ!”
पिता ठठाकर हँस पड़े और बोले – “ज़हर ? कैसा ज़हर ? मैंने तो तुम्हें ज़हर के नाम पर हाजमे का चूर्ण दिया था … हा हा हा !!!”
"बेटी को सही रास्ता दिखाये,

माँ बाप का पूर्ण फर्ज अदा करे"

Wednesday, 13 January 2016

तमन्नाये


हर इंसान बदल जाता है , जब मजबूरिया सताती है ,
हर जुबान बंद हो जाती है , जब रूसबाईयां नज़र आती है ,
बह जाता है वो पानी भी अपनी तरह जब विसाद ही न रहे
और अक्सर भूल जाती है लोग जब मुलाकात ही न रहे
अपने तोह निभा न सकें , तोह परायो को क्या दोष देना ,

बेहतर यही है की अपनी अलबेली तमन्नाओ को मिटा लेना 

Saturday, 31 October 2015

जलवायु परिवर्तन "GROWING TREES SAVE US"

में विचलित हो उठता हूँ जब यह खबर प्राप्त होती है की “किसी किसान ने अपनी जमीन में हुए फसल के नुकसान के कारण आत्महत्या की “ कितना दुखद होता है यह सह जाना की हमारा एक अन्यदाता अब नही रहा पर इन सब से हठ कर जरा विचार कीजिये क्या कारण हुए होंगे सामान्य व्यव्हार में यह व्यक्तिगत परिस्थिति ज्ञात होगी पर एसा नही है यह हरित क्रांति के अंत का प्रारंभ है l
प्रतिवर्ष हो रहे निरारंतर परिवर्तन और उन परिवर्तनों में पिसती सरकार ये नुक्सान केवल किसान का नही सरकारे भी मुआवजा बांटते –बांटते अपने कोषालय को खाली करती जा रही है l
विकास के अन्य कार्यो में लगने वाली पूंची मुआवजे के रूप में खर्च की जा रही है l किसान पर हो रहे इस प्रभाव को कोइ भी सरकार नज़रन्दाज नही कर सकती आखिर देश की 70% वोट बैंक का सवाल है यही किसान सरकार बनाते है यही गिरा भी सकते है अत: कहा जा सकता है किसानो को होने वाले नुकसान की भरपाई करना सरकार की मजबूरी है l पर यह तोह बस ऊंट के मुह में जीरा है किसान को इस नुक्सान से कुछ न के बारबार ही मुआवजा प्राप्त हो पता है l हमे मुआवजा बाँटने के आलावा कुछ आवश्यक जागरूकता अभियानों की आवश्यकता है l हमे फसल चक्र को अपनाना होगा खेती के नविन संसाधनों को विकसित करने की आवश्यकता है l तकनिकी मार्गदर्शन को बढावा देना होगा हम एक कृषि प्रधान देश है हमारी अथेव्यवस्था खेती पर बहुत हद तक निर्भर है l हमे इसका Commercialize व्यावसायीकरण  करना और बड़े पूछीपतियों को इसमे निवेश करने की और पहल करना चाहिए l केवल वर्षा पर निर्भर रहने वाली फसल या खेतो तक जल की पूर्ति की आवश्यकता है एसी योजनाओ में लगने वाला पैसा शायद मुआवजे से कम होगा l जीहाँ ये फसल की चिंता एक व्यपक चिंतन है में चिंतित फसल के एक बार नष्ट हो जाने से नही बल्कि लगातार हो रहे नुकसान से चिंतित हूँ जिसका एक मात्र कारण मुझे नज़र आता है वह है जलवायु परिवर्तन climate change ये इन हादसों का सबसे बड़ा कारण है आज भारत ही नही समूचा विश्व इस समस्या को विश्व की अन्तरराष्टीय समस्या मान चूका है वैज्ञानिक हमे लगातार आगाह कर रहे है और इस समस्या ने अपने पैर पसारना भी शुरू कर दिये  जलवायु परिवर्तन के कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगा है। अगर कुछ वैज्ञानिकों  मानें तो यह ग्लोबल वॉर्मिंग एक प्रकृतिजन्य प्रक्रिया का हिस्सा है, जो एक निश्चित समय चक्र पर लगातार होती है।
इसके कारण पृथ्वी पर रहने वाली सभी प्रजातियों को लगातार परिवर्तनशील होना पड़ता है। प्राकृतिक रूप से होने वाली ये प्रक्रियाएँ प्रजातियों के क्रमिक विकास के लिए फायदेमंद होती है। 
हालाँकि यह सिद्धांत पूरी तरह मान्य नहीं है और देखा जाए तो मानव गतिविधियों के कारण ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रभावों में तेजी से जलवायु परिवर्तन तेज हो गया है। अनेक पर्यावरणविदों व वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते हो रहा जलवायु परिवर्तन निकट भविष्य में कई प्रजातियों के विलुप्त होने का सबसे बड़ा कारण हो सकता है। और इसके कुछ उदाहरणों में जैसे
·         उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित कनाडा के बर्फीले मैदानों से ध्रुवीय भालू गायब होना
·         दक्षिण अमेरिका में समुद्री कछुएओ की वंशवृद्धि में गिरावट
·         चीन के विशाल पांडा का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है
·         जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे की आवृत्ति में वृद्धि के साथ-साथ जंगल में आग (बुशफायर) का भी लगातार खतरा बना हुआ है।
·         भारत में विशेषज्ञों का अनुमान है कि बाघों के सबसे बड़े क्षेत्र सुंदरवन डेल्टा में लगातार मैंग्रोव के जंगल गायब होते जा रहे हैं। दुनिया के सबसे बड़े मैंग्रोव क्षेत्र को समुद्र के स्तर में वृद्धि का भयानक परिणाम अपनी गोद में पल रही कई अनमोल प्रजातियों की जान से चुकाना पड़ रहा है। 
वंही निरंतर इस तरह की खबरे और असर दिखने भी लगा है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं और रेगिस्तान पसरते जा रहे हैं. कहीं असामान्य बारिश हो रही है तो कहीं असमय ओले पड़ रहे हैं. कहीं सूखा है तो कहीं नमी कम नहीं हो रही है कंही भूकंप तोह अन्य प्राकर्तिक आपदाओ की घटनाओ में लगातार वृद्धि हो रही है जिससे मनिविये जीवन अभूत पूर्ण क्षति होती जा रही है हमारे वर्षाकाल और सर्दियों  के दिन में गिरावट आई है और तापमान में लगातार वृद्धि आज वर्ष के 365 दिनों में से औसतन 220 दिन तापमान गर्म बना रहता है प्रथ्वी का तापमान यंहा विश्व में औसतन 15 c तक आ पहुंचा वाही भारत में नुयुनतम 18 c से 25 c तापमान वर्ष वर रहता है वैज्ञानिक मतअनुसार जिस प्रकार हम कार्बन व् अप्रम्परागित उर्जा का उपयोग कर रहे है प्रति 100 वर्ष में 6 c तापमान की वृद्धि संभव है अत; इसप्रकार शायद यह सभ्यता कुछ 10 शाताव्धियो की ही मेहमान है l मानव प्रजाति के भी खतरे में आने की शुरुआत हो चुकी है। बेतहाशा आबादी और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन ग्लोबल वॉर्मिंग को तेज कर रहा है। प्रकृति की हर प्रजाति कहीं न कहीं एक दूसरे से जुड़ी है, एक प्रजाति का सर्वनाश दूसरी प्रजाति पर आसन्न खतरे को अधिक विकट बनाता है। घटते संसाधनों और बढ़ती माँग ने इस समस्या को और भी जटिल बना दिया है, जिसे जल्दी सुलझाना पूरी पृथ्वी के हित में होगा। अन्यथा हम भी उन अन्य ग्रहों की श्रेणी में 10 शाताव्धि बाद गिने जायेंगे जन्हा जीवन की सम्भावनाये शून्य है हमारे लिए यह क्रमिक विकास की एक प्रक्रिया होगी हम एक तरह से कोइ सांफ सीडी का खेल खेल रहे है जैसे ही हम विकास (लक्ष्य) के नजदीक पहुंचेंगे हम फिर प्रारंभ पर बैठेंगे जीवन नष्ठ होगा पर सम्भावनाये नही l
हमे नविन उर्चा का सर्जन की आवश्यकता है अप्रम्पराह्गत उर्चा के संसाधन हमे ही निगलते जा रहे है प्रराम्परागत उर्चा का उत्सजन हमारी अवश्यक ही नही मजबूरी है सौर्य उर्चा –पवन उर्चा –बोइगेस जैसे संसाधनों में सम्भानाये तलाशना होगीं हमे CC  COUL & CORBEN का उपयोग नुन्य्तम करना होगा नही तोह यह हमारी CC (कम्पलीशन सर्टिफिकेट ) जारी कर देंगे C&C जितना कम होगा तापमान में संतुलन उतना बेहतर होगा l वातावरण मनविये क्रिया कलापों के कारण  कार्बन का प्रतिशत बड़ा है जिसको संतुलित करने का एक मात्र मंत्र है वृक्षारोपण जी हाँ केवल वृक्ष ही एक मात्र वह शिव है जो इस जहर को अवशोषित कर सकते है और अमृत रूप (ओक्स्सिज़न)में बदल सकते है l मेरा मत है विश्व की 7 अरव जनसँख्या मिल कर प्रतिवर्ष अपने जन्म दिवस पर  1 वृक्ष लगाती है तोह यह परंपरा हमे बहुत आगे तक लेकर जाएगी एसा करने वाले कुछ राज्य और देशो की में सराहना करता हूँ पर इस कैम्पेन को “GROWING TREES SAVE US “ के नाम से शुरू करना चाहिये हमे प्रत्येक शासकीय परिसर –आवासीय भवन –पार्क बंजर भूमि –पहाड़ व् नदी नालो का उपयोग इसी कैम्पिंन के लिए करना चाहिये l
नोट :-आप अपना मत और सुचाव मुझे मेल कर सकते है 
BY :-ANURAG SHARMA 
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Sunday, 20 September 2015

THE FIRE OF RESERVATION

आज शिक्षक वर्ग में एक असंतोष की लहर है , में नही जनता वह आचार्य चाणक्या के अनुयायी है या गुरु द्रौण के भगत हाँ मेने इतना तोह जाना है यह वाही शिक्षक है जो बच्चो को महात्मा गाँधी के किस्से पड़ाते है गाँधी जी के सत्याग्रह पर किसी छात्र के निबंध को जाँचने वाले शायद यही शिक्षक है ,
यह कितना निराशाजनक है जब इतिहास लिखा जायेगा तोह कल्पना भी नही की जाकेगी शिक्षको को अपने आधिकारो के लिये कलम छोडनी पड़ी ,
क्या सच में शस्त्र की आवश्यकता है स्वयं विचार करे क्या कलम एक शस्त्र नही क्या हासिल होगा हिंसा से?
हम आहिंसा और अनुशासन में रह कर भी अपनी बात रख सकते है ,यही तोह सिखाया है हमे हमारे महात्माओ ने आज देश आरक्षण की आग में झुलस रहा है जिसके दूरगामी परिणाम दुखद होंगे ,
और इतने में ये शिक्षको का तड़का 2 गुटों की राजनीती को आमंत्रित करेगा में चाहूँगा शिक्षक अपनी बात रखे और सरकार उन्हें सम्मान पूर्वक उन्हें उनके हक से नाबजे पर सरकार को भी शिक्षको के आधिकार विरोधी बातो हवा नही देने की आवश्यकता है और शिक्षक रहे अपनी बात पर परन्तु बच्चो का नुकसान न हो और शिक्षा का सम्मान व् गरिमा बने रहे यह ध्यान रखना होगा यह विचार भी करना ही होगा , यह तोह हट हुइ आप अपनी बात रखे पर एसे नही जिसमे छात्रों को हर्जाना भुगतना पड़े l हिंसा और हट पर आप आधिक समय तक अड़े रहे तोह कुछ राजनेतिक विरोधी आपको उपयोग करने लगेंगे l
में शिक्षको से आवाहन करूँगा वह देश की मुख्य समस्या में अपना सहयोग करे आज हमारा देश आरक्षण से झुच रहा है l
अब देश में पुनह सरकार विरोधी गतिविधियों जा जन्म हुआ है हम राजस्थान में हुए गुर्जर आन्दोलन से अच्छी तरह बाकिब है और राजस्थान में हुए अभूत पूर्ण आर्थिक क्षति उपरांत एक बार फिर गुजरात पटेलो के आरक्षण में जल रहा है यह आग में पानी जल्द ही डालना होगा यह आग महारास्ठ के मराठा से लेकर हरियाणा के जाटो तक पहुंचेंगे फिर हर राज्य आरक्षण की मांग करेगा जाति ,वर्ग और धर्म के आधार पर हमारी धर्मनिपेक्षता ओउंधे मुह गिर पड़ेगी यह आशांति का पहला विगुल होगा और एक दिन सब शांत हो जायेगा ,
हमे इस गृह युद्ध को सुरु होने से पहले ही रोकना होगा और गृह युद्ध का दर्द क्या होता है पूछो सीरिया से उन 80 लाख शरणार्थी से जो एक वक़्त के भोजन के मोहताज है न रहने को ठिकाना है न खाने को न पानी प्यास बुझाने को क्या आप भी चाहते हो कोइ मासूम बालक हमारे समुदिये तटो पर औंदे मुह मृत प्राप्त हो बंद करो से आरक्षण का विगुल इसका स्वर सर्नाश की ध्वनि का पर्यावाची है l
क्या सच में आवश्यकता है आरक्षण की आपको या आपकी आने वाली पीढ़ी को आपको न होगी पर आप क्या छोड़ कर जा रहे हो आने वाली पीढ़ी को क्या कहेगा भविष्य जब इतिहास लिखा जायेगा राजा भारत के वंशज आपस में ही लड़ मर गये ,
क्या यही इस सभ्यता का अंत होगा अगर आरक्षण न थमा तोह निच्चित ही इतिहास हमे कोसेगा l

में अपने लेख के माध्यम से शांति का आवाहन करता हूँ मेरे लेख को व्यक्तिगत न लेते हुए सामाजिक व्यवस्था में आये व्यवधान को दूर करने का प्रयास समझे और यंहा आवश्यता आक्रोश की नही एकता की है 
                                                                                            BY- ANURAG SHARMA (प्राक्रतिक )
SUB ENGINEER 
mail - sharmaanu411@gmail.com
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TIME REVOLT कंही वक़्त बगावत न कर बैठे

कंही वक़्त बगावत न कर बैठे , ये हम से शिकायत न कर बैठे l
रोको इस अविनाशी क्षण मात्र को, ये सवाल जबाब न कर बठे ll
                कंही वक़्त बगावत न कर बैठे ..............................2
                                   --००--
यंहा निमेश एक में मित्र है , होते वक़्त के दामन में नित्य छिद्र है l
मा के आईने से मेने देखा है ,यंहा फिरते जगत में बनकर सब प्रेत है
यंहा प्रीति बेर विकने लगे ,और तट सरजू के दंगे है l
आस्था रह गई आकेली , और  मलिन गंगा के चर्चे है ll
जन्हा कुटिल योजनाओ का , मंदिर मज्जिद पर फहरा है l
दूल्हा कोइ नही पर , हर सर पर सजा एक सेहरा है ll
अब अंबर को जमी तक खीचा है , और चाँद पर होता रोज एक मेला है l
यंहा होता हर चौराये पर एक नया लंगर है l
फिर भी गरीब सोता भूखा घर के अन्दर है ll
बदल डालो अपनी प्राणली को, कंही प्रणय अंत न कर बैठे l
रोको इस अविनाशी क्षण मात्र को, कंही वक़्त बगावत न कर बैठे ll.....2
--००—
न बनाओ एसे आसरे , जन्हा ऊँचे हो हमारे आशियाने l
ये सने सने गिर जायेंगे हम मुसीबतों में गिर जायेंगे ll
रोक सको तोह रोक लो , इस कण कण क्षण की माया को
अन्यथा ये आगे अन्य राह में , आगे न निकल बैठे l
हमे छोड़ अपनी होड़ में ,ये आगे न निकल बैठे ll
समय तोह सीमाये लाँघ गया संयम शिविर न छोड़ बैठे l 
रोको इस अविनाशी क्षण मात्र को, कंही वक़्त बगावत न कर बैठे ll.......2
--००-
क्या होगा अगर वक़्त बगावत कर बैठे
कंही बाघ दहाड़ना भूल गया , और मन पंक्षी के मीत गया l
वृक्ष स्वार्थ न समझ बैठे , वायु अद्रोध न कर बैठे ll
कोकिल जब गाना भूल गये तोह मयूरा सावन भूल गया l
ये नियति नियत न हो जाये, क्षण ताबूत में न सो जाये ll
इससे पहले हम जाग जाये, सोते समय को साथ लाये l
जीवन को सुखमय,सुखद, और सफल बनाने को
अओ हम सब मिल कर आगे आये ll .........2


                                                                                              BY- ANURAG SHARMA (प्राक्रतिक )
SUB ENGINEER 
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