Thursday, 31 October 2024

शिवमहिम्नस्तोत्रम् हिंदी अनुवाद

                                              श्री शिवमहिम्नस्तोत्रम् हिंदी अनुवाद 

श्री पुष्पदंत जी कहते हैं !

1

महिमा के अंत तक पहुँच पाए सर्वोच्च विद्वान एवं योगीजन भी आपकी महिमा को नहीं जान पाए l ब्रह्मा आदि भी आपकी स्तुति कर पाने मे असमर्थ है , क्योँकि वेदों में एसा कोई शब्द नही जो आपकी महिमा का वर्णन कर सके आप शव्द में स्वयं निवास करते हैं। फिर सभी वक्ताओं ने अपने-अपने मन की सीमा तक पाठ किया। आप कृपया मेरे हृदय के भाव को देखें और मेरी स्तुति को स्वीकार करें॥

2

अतीत के मार्ग में एसा कोई नही जिसने आपकी व्याख्या को मन और वचन से पार पाया हो l आपके संदर्भ में वेदों में भ्रांति हैं l किन स्त्रोतों से आपकी प्रशंसा की जा सकती है l आपके गुण कितने प्रकार के हैं l जैसे विषयो में वेद भी अचंभित है l वेदों के अनुसार आपके चरण अति त्वरित है l इसलिए आपकी महिमा और आपके स्वरूप की व्यख्या न ही मन और न बजन द्वारा की जाना संभव है l

3

आपने मधु-भरे शब्दों से अमृतमय वेदों की रचना की है। आप ही वेद और भाषा के सृजनकार है ! देवताओं के गुरु बृहस्पति जब आपकी स्तुति करते है तो अपने ही शव्दों से उनके कदम आश्चर्यचकित हो लड़खड़ाने लगते है l मैं भी अपनी वाणी से आपका गुणानुवाद करने का प्रयास कर रहा हूं। आपका पुनह – पुनह समर्रण करने से मेरी वाणी उसी तरह शुद्ध हो जाएगी जिस प्रकार दूध को बार बार मथने से मक्खन की प्राप्ति हो जाया करती है अर्थात इससे मेरी बुद्धि अधिक पवित्र और लाभान्वित होगी l

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आपके ही एश्वर्य से जगत् का उदय, रक्षण और विनाश होता है ।त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु और महेश )का उद्देश्य विभिन्न विधाओं के तीन गुणों में फैला हुआ है l आपके सुन्दर से भी अधिक सुन्दर रमणीय स्वरूप का स्मरण करने से अभागों का भी कल्याण होता है l विधाता द्वारा रचे कुछ मंदबुद्धि विभिन्न प्रकार के तर्क करते है l जैसे  

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यह क्या है, वह शरीर क्या है और तीनों लोकों का साधन क्या है? विधाता जो रचना करता है उस घटक का आधार क्या है ?

अनेक प्रकार के तर्कों से में अवसर की कमी से निराश हूं l यह कुतर्क करने की गलत धारणा लोगों को संसार के भ्रम की ओर ले जाती है ।

6

अजन्मे संसारों की उत्पत्ति किन घटकों से हुई है l इसे कोई नही जानता l ऐसा क्यों है कि जिसने इस संसार को धारण किया हुआ है l  पर जन्म के नियम की उपेक्षा भी नही की जा सकती मेरा मत है कि आपके अतिरिक्त संसार की रचना में कोई अन्य सहायता कर ही नही सकता है l परन्तु मंद बुद्धि वाले अज्ञानी लोग प्रमाणों पर संदेह करते हैं॥

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हे शिव ! आपको पाने के लिए अनगिनत मार्ग है – सांख्य मार्ग, वैष्णव मार्ग, शैव मार्ग, वेद मार्ग आदि। लोग अपनी रुचि के अनुसार कोई मार्ग को पसंद करते है। जैसे अलग अलग नदियों का पानी बहकर समुद्र में जाकर मिलता है उसी प्रकार ये यह सभी मार्ग आप तक पहुंचाते हैं। सचमुच, किसी भी मार्ग का अनुसरण करने से आपकी प्राप्ति हो सकती है ॥

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आपको समर्पित समस्त देवता अनेक प्रकार की समृद्धि को रखते हैं l आपने स्वयं के लिए सिर्फ कुल्हाड़ी, तलवार, हिरण की खाल, फीनिक्स की राख, कपाल एवं ऋणी चेतना तत्व ही आपके तंत्र उपकरण है l इससे ये फलित होता है , कि जो आत्मानंद में लीन रहता है वो संसार के भोग पदार्थों में नहीं फंसता क्योंकि आत्म-संतुष्टि की वस्तु मृग-वासना से धोखा नहीं खाती।

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निश्चय ही कोई सब कुछ है l और जो सकल तत्व का देना वाला है । वह निश्चित ही निश्चय जगत से परे है l जो व्यस्त दुनिया के बारे में बात करता है l संसार के इस मंथन पर हर कोई हैरान नजर आया l मैं आपकी प्रशंसा करता हूं l क्योंकि आप में समस्त तत्व होने के बाद भी अहंकार नही है

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हे प्रभु ! जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच विवाद हुआ की दोनों में से कौन महान है l तब आपने उनकी परीक्षा करने के लिए अग्नि स्तंभ का रूप लिया। ब्रह्मा और विष्णु – दोनों ने स्तंभ को अलग अलग छोर से नापने की कोशिश की मगर वो सफल न हो सके। आखिरकार अपनी हार मानकर उन्होंने आपकी स्तुति की जिससे प्रसन्न होकर आपने अपना मूल रूप प्रकट किया । क्या ऐसा कभी हो सकता है भला कि आपकी स्तुति समर्पित भाव एवं सच्चे ह्रदय से कि जाए और उसका फल प्राप्त न हो l

11

हे विश्वनाथ ! आपके परम भक्त रावण ने पद्म की जगह अपने नौ-नौ मस्तक आपकी पूजा में समर्पित कर दिये। जब वो अपना दसवां मस्तक काटकर अर्पण करने जा रहा था, तब आपने प्रकट होकर उसको वरदान दिया। इस वरदान की वजह से ही उसकी भुजाओं में अटूट बल प्रकट हुआ और वो तीनो लोक में शत्रुओं पर विजय पाने में समर्थ रहा। ये सब आपकी दृढ़ भक्ति का नतीजा है॥

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हे कैलासी ! आपकी परम भक्ति से रावण अतुलित बल का स्वामी बन बैठा l आपकी पूजा के लिए हर रोज कैलाश जाने का श्रम बचाने के लिए वह कैलाश को उठाकर लंका में गाड़ देना चाहा। जब कैलाश उठाने के लिए रावण ने अपनी भुजाओं को फैलाया तब पार्वती भयभीत हो उठीं। उन्हें भयमुक्त करने के लिए आपने सिर्फ अपने पैर का अंगूठा लगाया तो रावण जाकर पाताल में गिरा और वहां भी उसे स्थान नहीं मिला।

13

अर्थ:
हे शम्भो ! आपकी कृपा मात्र से ही बाणासुर दानव इन्द्रादि देवों से भी अधिक ऐश्वर्यशाली बन गया तथा तीनों लोकों पर राज किया। हे ईश्वर ! जो मनुष्य आपके चरण में श्रद्धा भक्तिपूर्वक शीश रखता है उसकी उन्नति और समृद्धि निश्चित है।।

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हे नीलकंठ ! जब समुद्र मंथन हुआ तब अन्य मूल्यवान रत्नों के साथ महाभयानक विष निकला, जिससे समस्त सृष्टि का विनाश हो सकता था। जिसको देख अखिल ब्रह्माण्ड के चर अचर जीव , देवता और राक्षस भय से चकित थे l आपने बड़ी कृपा करके सिद्ध तृणय विधि ( पानी से विष को अलग करने की विधि ) से उस विष को इकत्रित कर पान किया। विषपान करने से आपके कंठ में नीला चिन्ह हो गया और आप नीलकंठ कहलाये। परंतु हे प्रभु क्या ये आपको कुरूप बनाता है? कदापि नहीं, ये तो आपकी शोभा को और बढ़ाता है। जो व्यक्ति औरों के दुःख दूर करता है उसमें अगर कोई विकार भी हो तो वो पूजा पात्र बन जाता है।।

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हे दिगंबरम ! देवताओं और दानवों में उद्देशो की प्राप्ति के लिए सदैव प्रयत्न करते रहते है l  कामदेव जिनके वाण सदैव ही विजय प्राप्त करते परन्तु जब कामदेव ने आपकी शक्ति समझे बिना आप की ओर अपने पुष्प बाण को साधा तो आपने उसे तत्क्षण ही भस्म कर दिया।  यह जगत में प्रसिद्ध है कि श्रेष्ठ जनों के अपमान का परिणाम हितकर नहीं होता।।

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हे नटराज ! जब संसार के कल्याण हेतु आप तांडव करने लगते हैं तब समग्र सृष्टि भय के मारे कांप उठती है, आपके पद प्रहार से पृथ्वी अपना अंत समीप देखती है ग्रह नक्षत्र भयभीत हो उठते हैं। आपकी जटा के स्पर्श मात्र से स्वर्ग लोग व्याकुल हो उठता है और आपकी भुजाओं के बल से वैकुंठ में खलबली मच जाती है। हे महादेव ! आश्चर्य ही है कि आपका बल अतिशय कष्टप्रद है॥

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हे गंगाधर !  गंगा नदी जब मंदाकिनी के नाम से स्वर्ग से उतरती है तब नभोमंडल में चमकते हुए सितारों की वजह से उसका प्रवाह अत्यंत आकर्षक दिखाई देता है, मगर आपके सिर पर सिमट जाने के बाद तो वह एक बिंदु समान दिखाई पड़ता है। बाद में जब गंगा जी आपकी जटा से निकलती है और भूमि पर बहने लगती है तब बड़े-बड़े द्वीपों का निर्माण करती है। ये आपके दिव्य और महिमावान स्वरूप का ही परिचायक है।।

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हे त्रिपुरारी ! आपने (तारकासुर के पुत्रों द्वारा रचित) तीन नगरों का विध्वंस करने हेतु पृथ्वी को रथ, ब्रह्मा को सारथी, सूर्य चन्द्र को दो पहिये मेरु पर्वत का धनुष बनाया और विष्णु जी का बाण लिया। हे शम्भू ! इस वृहद प्रयोजन की क्या आवश्यकता थी? आपके लिए तो संसार मात्र का विलय करना अत्यंत ही छोटी बात है। आपको किसी सहायता की क्या आवश्यकता?  आपके लिए तो केवल यह अपने नियंत्रण में रही शक्तियों के साथ क्रीडा करना मात्र था,

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हे चन्द्रमोलेषर ! जब भगवान विष्णु ने आपकी सहस्र कमलों द्वारा पूजा प्रारम्भ की तो उन्होंने एक कमल कम पाया। तब भक्ति भाव से विष्णु जी ने अपनी एक आँख को कमल के स्थान पर अर्पित कर दिया। उनकी ऐसी अदम्य भक्ति से उस नेत्र ने सुदर्शन चक्र का स्वरूप धारण कर लिया जिसे भगवान विष्णु संसार रक्षार्थ के लिए उपयोग करते हैं। हे प्रभु, आप तीनो लोक (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) की रक्षा के लिए सदैव जागृत रहते हो।।

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हे सदाशिव ! यज्ञ की समाप्ति होने पर आप यज्ञकर्ता को उसका फल देते हो। आपकी उपासना और श्रद्धा बिना किया गया कोई कर्म फलदायी नहीं होता। यही वजह है कि वेदों में श्रद्धा रखके और आपको फल दाता मानकर हर कोई अपने कार्यों का शुभारंभ करते है॥

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हे रूद्र ! दक्ष प्रजापति के महायज्ञ यज्ञ को जिसमें स्वयं ब्रह्मा तथा अनेकानेक देवगण तथा ऋषि-मुनि सम्मिलित हुए, आपने नष्ट कर दिया क्योंकि उसमें आपका सम्मान नहीं किया गया। आपने यज्ञ कर्म और फल का विधान बनाया है l तद्यपि जो यज्ञ शुद्ध विचारों और कर्मो से प्रेरित न हो और आपकी अवहेलना करने वाला हो उसका परिणाम कदाचित विपरीत और अहितकर ही होता है l

22

हे वैधनाथ ! सदैव प्रजा की रक्षा करने वाले प्रजानाथ जब मृगी रूप धारण करने वाली अपनी कन्या में आसक्त देख काल से प्रेरित हो ब्रह्मा ने मृग रूप धारण किया , तब आपके द्वारा उनके पीछे छोड़ा गया बाण आर्द्रा आज भी नक्षत्र रूप में मृगशिरा (ब्रह्मा) के पीछे है।

23

हे आशुतोष ! जब स्वयं कामदेव ने आपकी तपश्चर्या में बाधा डालनी चाही तब आपने कामदेव एवं उनके धनुष को किसी सूखे तृणवत् की तरह भस्म कर दिया। हे अर्द्नारिश्वर आदि शक्ति आपके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित है क्योकि आपके शरीर का आधा हिस्से पर उनका अधिकार का है,  आप उस स्वरूप में अति सुन्दर प्रतीत होते है जिससे हर युवती आपकी सुंदरता पर मुग्ध आपके दर्शन के लिए आती हैं। ।।

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हे भूतभावन !!! आप श्मशान में रमण करते हैं, भूत - प्रेत आपके मित्र हैं, आप चिता भस्म का लेप करते हैं तथा मुंडमाला धारण करते हैं। ये सारे गुण ही अशुभ एवं भयावह जान पड़ते हैं। तब भी हे श्मशान निवासी ! उन भक्तों जो आपका स्मरण करते है, आप सदैव शुभ और मंगल करते है।।

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हे आदियोगी ! जिस प्रकार अमृतमय सरोवर में अवगाहन से (स्नान करने से) प्राणिमात्र तापत्रय से मुक्त हो जाते हैं, उसी प्रकार इन्द्रियों से पृथक करके मन को स्थिर कर विधिपूर्वक प्राणायाम से पुलकित तथा आनन्दाश्र से युक्त योगीजन ज्ञान दृष्टि से जिसे देखकर परमानंद का अनुभव करते हैं, वह आप ही हैं ।।

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हे सर्वेश्वर ! आप ही सूर्य, चन्द्र, धरती, आकाश, अग्नि, जल एवं वायु हैं। आप ही आत्मा भी हैं। हे देव ! मुझे ऐसा कुछ भी ज्ञात नहीं जो आप न हों ।।

27

हे महेश ! ॐ शब्द अ, , म से बना है। ये तीन शब्द तीन लोक – स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल; तीनों देव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा तीन अवस्था – स्वप्न, जागृति और सुषुप्ति के द्योतक है। लेकिन जब पूरी तरह से ॐ कार का ध्वनि निकलता है तो ये आपके तुरीय पद (तीनों से पर) को अभिव्यक्त करता है॥

28

वेद एवं देवगण आपकी इन आठ नामों से वंदना करते हैं – भव, सर्व, रूद्र , पशुपति, उग्र, महादेव, भीम, एवं इशान। हे सर्व शक्तिमान ! मैं भी आपकी इन नामों की भावपूर्वक स्तुति करता हूं॥

29
हे त्रिनेत्र ! सबसे प्रतिष्ठित, सबसे प्रिय और सबसे दिव्य को मेरा प्रणाम । आप अति अधम से लेकर अति बलशाली के रक्षक और महानतम संघारक को मेरा नमस्कार । आप सब से दूर हैं फिर भी सब के पास है। आप अति सूक्ष्म है फिर भी विराट है।  आप वृद्ध है और युवा भी है। आप सब में है फिर भी सब से पर है। अत: हे तीन नेत्रों वाले प्रभु को मेरा प्रणाम।

30
हे शंशाक ! मैं आपको रजोगुण से युक्त सृजनकर्ता जान कर आपके ब्रह्म स्वरूप को नमन करता हूं। तमोगुण को धारण करके आप जगत का संहार करते हो, आपके उस रुद्र स्वरूप को मैं नमन करता हूं। सत्वगुण धारण करके आप लोगों के सुख के लिए कार्य करते हो, आपके उस विष्णु स्वरूप को नमस्कार है। इन तीनों गुणों से पर आपका त्रिगुणातीत स्वरूप है, आपके उस शिव स्वरूप को मेरा नमस्कार है।।

31

हे आशुतोष ! मेरा मन शोक, मोह और दुःख से संतप्त तथा क्लेश से भरा पड़ा है। मैं दुविधा में हूं कि ऐसे भ्रमित मन से मैं आपके दिव्य और अपरंपार महिमा का गान कैसे कर पाउंगा ? फिर भी आपके प्रति मेरे मन में जो भाव और भक्ति है उसे अभिव्यक्त किये बिना मैं नहीं रह सकता। अतः ये स्तुति की माला आपके चरणों में अर्पित करता हूं॥

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हे महादेव ! यदि समुद्र को दवात बनाया जाए, उसमें काले पर्वत की स्याही डाली जाय, कल्पवृक्ष के पेड़ की शाखा को लेखनी बनाकर और पृथ्वी को कागज बनाकर स्वयं ज्ञान स्वरूपा माँ सरस्वती दिनरात आपके गुणों का वर्णन करें तो भी आप के गुणों की पूर्णतया व्याख्या करना संभव नहीं है॥

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हे चिदंबरम ! आप सुर, असुर और मुनियों के पूजनीय है, आपने मस्तक पर चंद्र को धारण किया है, और आप सभी गुणों से परे है। आपकी इसी दिव्य महिमा से प्रभावित होकर मैं, पुष्पदंत गंधर्व, आपकी स्तुति करता हूं।।

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पवित्र और भक्ति भावपूर्ण हृदय से जो मनुष्य इस स्तोत्र का नित्य पाठ करेगा, तो वो पृथ्वीलोक में अपनी इच्छा के अनुसार धन, पुत्र, आयुष्य और कीर्ति को प्राप्त करेगा। इतना ही नहीं, देहत्याग के पश्चात् वो शिवलोक में गति पाकर शिवतुल्य शांति का अनुभव करेगा। शिवमहिम्न स्तोत्र के पठन से उसकी सभी लौकिक व पारलौकिक कामनाएँ पूर्ण होंगी ॥

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शिव से श्रेष्ठ कोई देव नहीं, शिवमहिम्न स्तोत्र से श्रेष्ठ कोई स्तोत्र नहीं है, भगवान शंकर के नाम से अधिक महिमावान कोई मंत्र नहीं है और ना ही गुरु से बढ़कर कोई पूजनीय तत्व ॥

36
शिवमहिम्न स्तोत्र का पाठ करने से जो फल मिलता है वो दीक्षा या दान देने से, तप करने से, तीर्थाटन करने से, शास्त्रों का ज्ञान पाने से तथा यज्ञ करने से कहीं अधिक है।।

37
सभी गंधर्वों के राजा पुष्पदंत भाल में चंद्रमा को धारण करने वाले देवाधिदेव महादेव जी के दास थे। वे सुरगुरु महादेव जी के क्रोध से अपनी महिमा से भ्रष्ट हुए, तब उन्होंने शिवजी की प्रसन्नता के लिए इस परम दिव्य शिवमहिम्न स्तोत्र को बनाया ॥

38
जो मनुष्य अपने दोनों हाथों को जोड़कर, भक्ति भावपूर्ण, इस स्तोत्र का पठन करेगा, तो वह स्वर्ग-मुक्ति देने वाले, देवता और मुनियों के पूज्य तथा किन्नरों के प्रिय ऐसे भगवान शंकर के पास अवश्य जायेगा। पुष्पदंत द्वारा रचित यह स्तोत्र अमोघ और निश्चित फल देने वाला है ॥

॥39॥
हे प्रभु ! वाणी के माध्यम से की गई मेरी यह पूजा आपके चरण कमलों में सादर अर्पित है। कृपया इसका स्वीकार करें और आपकी प्रसन्नता मुझ पर बनाए रखें ।।

40॥
हे शिव ! हे महेश्वर ! मैं आपके वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता। लेकिन आप जैसे भी है, जो भी है,

मैं आपको मन , बजन , और वाणी से साष्टांग नमस्कार करता हूं ।।

 

 

                                                                                                                      अनुवादक

                                                                       शिवदास अनुराग शर्मा

                                                                       गुना ( म.प्र )

                                                                                मो:- 8223945111

                                                                                                                   sharmaanu411@gmail.com