विकासशील भारत की विकसित संविदा व्यवस्था
प्रस्तावना :- भाग -01
भारत में संविदा / ठेका
प्रणाली का एक प्राचीन इतिहास यह एक एसी प्रथा
थी l
जिसका उद्गम सभ्यत्ताओ की आवश्यकता के साथ हुआ और हजारो वर्षो के काल खंडो से गुजर
कर यह वृद्ध प्रथा अब एक युवा कुप्रथा का रूप ले चुकी है l
आइये इसके इतिहास पर प्रकाश डाले
o
वैदिक और महाकाव्य काल :- वैदिक
काल में व्यापार और लेन-देन के लिए "ऋण"
और "सौदे" की परंपरा थी।
भारतीय हिन्दू संस्कृति के मुख्य स्तम्भ ऋग्वेद और अर्थशास्त्र में ऐसे अनुबंधों (Contracts) और व्यापारिक संधियों का उल्लेख मिलता है। वैदिक काल में गुरुकुलों
और व्यापारिक समुदायों में लेन-देन
और सेवाओं का अनुबंध मौखिक या लिखित रूप में किया जाता था।
उदाहरण: :-
§ ऋग्वेद (10.117.8)
(10.117.8) "न स संनदते मर्तः, न च दस्यति यः पुनः। उत्पन्नं
वित्तमत्येति, भद्रा यस्यागृहे सती॥"
ऋग्वेद (3.45.4) "उद्
इन्द्र शुष्ममाचर, विश्वानि द्रविणा
कर्धि।"
§ अर्थशास्त्र
§ (अध्याय
3, श्लोक 1.1) "सर्वं कार्यं प्रमाणेण, प्रमाणी हि व्यवहाराः।"
अर्थ:
§ "द्रविण" शब्द धन-संपत्ति
और व्यापारिक लेन-देन का प्रतीक है।
- जो व्यक्ति धन का लेन-देन नहीं करता या
उसे दूसरों के साथ साझा नहीं करता, वह नष्ट हो जाता है।
- जो धन संचित होता है, वह घूमता रहता है (अर्थात व्यापार में लगाया
जाता है)।
- यह श्लोक व्यापार के "विनिमय"
और "धन के प्रवाह" के महत्व को दर्शाता है।
- यहाँ "संविदा" (Contract) और "वाणिज्यिक संधियों" (Trade Agreements) के आधारभूत सिद्धांत निहित हैं।
- राजा और पुजारियों के बीच अनुष्ठान कराने के लिए विशेष समझौते (संविदा) होते थे
- मंदिरों में कारीगरों और शिल्पकारों को निर्धारित शर्तों पर काम दिया जाता था।
o
मौर्य और गुप्त काल (322 ईसा पूर्व – 550 ईस्वी):-
आचार्य चाणक्य के "अर्थशास्त्र" में ठेके पर काम देने, व्यापारिक
करार (Commercial Contracts) और
सरकारी अनुबंधों (Government Contracts) के
स्पष्ट नियम थे। मौर्य शासन में सड़क
निर्माण, जल
निकासी, और
सैनिक सेवाओं को ठेके पर देने की प्रणाली थी।
उदाहरण:
§
मौर्य साम्राज्य में व्यापारी और
शिल्पकार, राजा
के साथ अनुबंध करके व्यापार करते थे।
§
गुप्त काल में सोने और चांदी की मुद्राओं
पर "व्यापारिक अनुबंधों" की मुहर लगाई जाती थी।
o मध्यकालीन भारत (1000-1700 ईस्वी) दिल्ली सल्तनत और मुगल काल में सरकारी कार्यों, जैसे किलों, सड़कों, नहरों और हथियारों की आपूर्ति, के लिए ठेका प्रणाली विकसित हुई। अकबर के समय "जागीरदारी प्रणाली" एक तरह की संविदा व्यवस्था थी, जहां जागीरदार (Contractor) कर वसूलते और बदले में प्रशासनिक सेवाएँ देते थे। मुगल शासन में "इजारा प्रणाली" (Revenue Farming System) लागू की गई, जो आज की सरकारी टेंडर प्रणाली से मिलती-जुलती थी।
उदाहरण:
§
ताजमहल के निर्माण में कई शिल्पकारों
को अनुबंधित किया गया था ।
§
सैन्य और व्यापारिक ठेके दिए जाते थे, जिससे व्यापारी और सैनिक सेवाएँ प्रदान कर सकें।
1850 के दौरान जब अंग्रेज दो विशाल प्रोजेक्ट (भारतीय रेलवे
और डाक) पर कार्य करे थे तो उन्हें इन कार्यो के क्रियावान हेतु अपने देश से
कामकाजी लोगो में अधिक व्यय का अनुभव हुआ l उन्होंने भारत में प्रचलित संविदा / ठेका
प्रणाली को बेहतर विकल्प माना क्योकि भारत के तय
भुगतान य नियमित कार्य का कोई प्रावधान नहीं था l भारत के लोग सदियों से संविदा / ठेका
प्रणाली का पालन करते थे उसी दौरान अंग्रेजो ने पूरी व्यवस्था का अधयन्न कर उसी
संघटित कर भारत में व्यावसायिक और कानूनी अनुबंधों को विनियमित करने के लिए भारतीय
संविदा अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act,
1872) लागू
किया गया था। इस
अधिनियम का उद्देश्य अनुबंधों को स्पष्ट कानूनी ढांचा देना और व्यापार तथा
व्यक्तिगत लेन-देन को सुरक्षित बनाना था।
Ø
इस
अधिनियम को ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया था और इसे 1 सितंबर 1872 से लागू किया गया।
Ø
इस
कानून की संरचना लॉर्ड मेयो और लॉर्ड नॉर्थब्रुक के
गवर्नर-जनरल कार्यकाल के दौरान की गई थी।
Ø
इस
कानून को भारतीय विधायी परिषद (Indian Legislative Council) में पारित किया गया था।
Ø
इसके
निर्माण में मुख्य योगदान सर हेनरी सुमने मेन का था, जो उस समय भारत में कानून मंत्री थे।
Ø
यह
अधिनियम अंग्रेजी कॉमन लॉ (English Common Law) पर आधारित था।
“यह सच है कि ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों ने संविदा प्रणाली को संवैधानिक अस्तितिव प्रदान कर एक संगठित रूप दिया , लेकिन इसकी नींव भारत के प्राचीन व्यापारिक और प्रशासनिक नियमों में पहले से थी। “
संशोधन :- भाग -02
1)
विक्रय अधिनियम (The Sale of Goods Act, 1930): - भारतीय संविदा अधिनियम
के कुछ भागों को अलग
करके ‘विक्रय अधिनियम, 1930’ (Sale
of Goods Act, 1930) के रूप में लागू किया गया।
2)
भागीदारी अधिनियम (The Partnership Act, 1932) :- भारतीय संविदा अधिनियम के "साझेदारी (Partnership)" से जुड़े
प्रावधानों को अलग करके "भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932" के रूप में लागू
किया गया।
3)
मध्यस्थता और सुलह अधिनियम (The Arbitration and Conciliation Act, 1996) :- यह अधिनियम
भारतीय संविदा अधिनियम से जुड़ा हुआ है, क्योंकि इसमें विवाद समाधान (Dispute Resolution) के वैकल्पिक तरीके (ADR) प्रदान किए गए हैं।
4)
मध्यस्थता अधिनियम (The Mediation Act, 2023) :- यह नया कानून भारतीय संविदा अधिनियम के तहत विवाद निपटाने के लिए
मध्यस्थता (Mediation) को
कानूनी रूप से मान्यता देता है।
5)
प्रस्तावित संशोधन – भारतीय संविदा
(संशोधन) विधेयक, 2024 :- धारा 15 (दबाव
- Coercion) को संशोधित करने
का प्रस्ताव है, ताकि
"भारतीय दंड संहिता" के स्थान पर "किसी भी कानून द्वारा निषिद्ध
कृत्य" जोड़ा जाए। (यह संशोधन अभी संसद में लंबित
है)
प्रावधान :-
भाग -03
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872) में सरकार द्वारा संविदा (Contract) के आधार पर सेवाएं प्राप्त करने हेतु प्रावधान :-
·
अनुच्छेद 299 - भारतीय संविधान (Article 299 - Indian Constitution):- अनुच्छेद
299(1) के अनुसार, भारत सरकार और राज्य सरकारें केवल विधिपूर्ण तरीके से और उचित अधिकार
प्राप्त अधिकारियों के माध्यम से संविदा कर सकती हैं। भारतीय
संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 10 – वैध अनुबंध (Essentials of a Valid Contract) सरकार
द्वारा किसी व्यक्ति/एजेंसी से सेवाएं प्राप्त करने के लिए जो अनुबंध किया जाता है, उसे संविदा अधिनियम की धारा 10 के अनुसार वैध (Valid) होना चाहिए। इसमें सहमति (Consent),
विधिपूर्ण उद्देश्य (Lawful
Object), और सक्षम पक्ष (Competent Parties) आदि
आवश्यक होते हैं। धारा 23 – संविदा
का विधिपूर्ण उद्देश्य (Lawful Object) - संविदा अवैध कार्यों (Unlawful Acts) के लिए नहीं हो
सकती।
समय सीमा :- भाग -04 :- भारत
में संविदा (Contractual) सेवाओं
की एक निश्चित
समय-सीमा होती
है, संविदा सेवाओं की अधिकतम अवधि (Contract Duration Limitations) कोई
संविदा सेवाएं अनिश्चित काल तक जारी नहीं रह सकतीं , सामान्यतः संविदा सेवाओं की अवधि 1 वर्ष, 3 वर्ष, या अधिकतम 5 वर्ष
तक होती है। सरकारी विभागों में संविदा कर्मचारियों
की नियुक्ति 6 महीने, 11 महीने, या 1-3 वर्षों के लिए की जाती है, और
यह नवीनीकरण (Renewable) हो
सकती है।
महत्वपूर्ण
बात:
संविदा कर्मचारी सरकारी स्थायी कर्मचारियों (Permanent
Employees) के समान नहीं होते। क्योकि भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872) के आधार पर संविदा कर्मचारियों को स्थायी करने का कोई प्रावधान नहीं है ?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले: संविदा कर्मचारी = स्थायी नहीं सुप्रीम कोर्ट ने
"उमादेवी बनाम भारत सरकार (2006)" मामले
में निर्णय दिया कि संविदा कर्मचारी को स्वतः स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं मिल
सकता। यदि सरकार किसी संविदा कर्मचारी को स्थायी करना चाहती है,
तो उन्हें एक सामान्य भर्ती प्रक्रिया (Regular
Selection Process) से गुजरना होगा।
वर्ष 2016
में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा निम्न बिन्दुओ
में स्पष्टता जाहिर कि थी
Ø
संविदा कर्मचारियों को बिना किसी भर्ती
प्रक्रिया के स्थायी नहीं किया जा सकता।
Ø संविदा
कर्मचारी स्थायी कर्मचारी (Permanent
Employee) बन सकते हैं?
Ø किसी
संविदा कर्मचारी को केवल संविदा पर काम करने के आधार पर सरकार का स्थायी हिस्सा
नहीं माना जाता।
Ø भारतीय
कानून के तहत संविदा
कर्मचारी को स्वतः स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं मिलता, भले ही वह वर्षों तक सेवाएँ देता रहे।
Ø यदि
सरकार को लगता है कि संविदा कर्मचारी की सेवाएँ आवश्यक हैं, तो वह एक नई स्थायी भर्ती प्रक्रिया (Regular
Recruitment Process) शुरू कर सकती है।
Ø संविदा
कर्मचारियों को स्थायी करने के लिए राज्य सरकारें
या केंद्र सरकार विशेष नियम बना सकती हैं, लेकिन
इसके लिए नीति (Policy) की आवश्यकता
होती है।
सम्भावना :- भाग -04 :-
भारतीय
संविदा अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872) एक सामान्य कानून (General Law) है, जो सभी प्रकार की संविदाओं (Contracts) पर
लागू होता है। यदि सरकार संविदा सेवाओं को स्थायी करने या उनकी अवधि बढ़ाने से संबंधित
कोई नया प्रावधान जोड़ना चाहती है, तो
यह संभव है
विकल्प
क्र -1 :- प्रस्तावित
नई धारा
यदि सरकार चाहती है कि संविदा सेवाएँ एक निश्चित अवधि (जैसे 5 या 10 वर्ष) के बाद स्थायी हो जाएँ, तो वह भारतीय संविदा अधिनियम में एक नई धारा जोड़ सकती है,
(Example of a New Section in Indian Contract Act, 1872) "धारा
10A: संविदा
सेवाओं की स्थायित्व सीमा"
"यदि कोई व्यक्ति लगातार 10 वर्षों तक एक ही संगठन
के लिए संविदा कर्मचारी के रूप में सेवा देता है, और उसका कार्य आवश्यक
माना जाता है, तो उसे स्थायी कर्मचारी बनाए जाने का अधिकार होगा।"
विकल्प
क्र -2 सरकारी
सेवा नियमों में संशोधन (Amending Service Rules) :- सरकार अपने सेवा नियमों (Service Rules) में संशोधन कर सकती है, ताकि कुछ निश्चित संविदा पदों को नियमित करने की प्रक्रिया बनाई जा
सके। उदाहरण
के लिए, केंद्र
सरकार या राज्य सरकार एक नई नीति बना सकती है कि 10 वर्षों
तक संविदा पर काम करने वाले कर्मचारियों को नियमित किया जाएगा।
विकल्प क्र -3 एक नया अधिनियम बनाना (Creating
a New Act) सरकार एक नया अधिनियम बना सकती है, जैसे: "संविदा
कर्मचारियों की सुरक्षा अधिनियम, 2025" इसमें
संविदा कर्मचारियों की अवधि, लाभ,
और नियमितीकरण की प्रक्रिया तय की जा सकती है।
विकल्प क्र -4 संविदा
सेवा नियमों में अनुबंध की न्यूनतम अवधि तय करना सरकार
यह नियम बना सकती है कि संविदा कर्मियों को न्यूनतम 5 या 10
वर्षों तक सेवा देने का अधिकार होगा।
संभावित परेशानी :- भाग -05
संविदा
सेवाओं को स्थायी करने में आने वाली कानूनी अड़चनें संविदा
कर्मचारियों को स्थायी करने में कुछ संवैधानिक और
कानूनी चुनौतियाँ आ सकती हैं, जैसे:
1)
अनुच्छेद 14 और 16 (समानता का
अधिकार) – यदि
सरकार बिना किसी प्रतियोगी प्रक्रिया (Competitive
Exam) के संविदा कर्मचारियों को स्थायी कर देती है, तो यह अन्य योग्य उम्मीदवारों के साथ अन्याय होगा।
2)
सुप्रीम कोर्ट के फैसले – "उमा
देवी केस 2006" में
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविदा
कर्मचारियों को बिना भर्ती प्रक्रिया के स्थायी नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष :-
उपरोक्त
अनुसार विकल्पों से यह कुप्रथा का अंत संभव है l
भारत सरकार को संसद में धारा 15 (अनुबंध में दबाव - Coercion) के संशोधन का प्रस्ताव फरवरी 24
में लाया गया था यह संशोधन अभी संसद में लंबित है संविदा /
ठेका प्रणाली को पूरी तरह से ख़त्म किया जाना भी उचित नहीं यह व्यवस्था अनेक प्रकार
की सुविधाओ को देने वाली है परन्तु इस व्यवस्था को एक कु-प्रथा का रूप देते ही
इसकी अनिच्छित समय सीमा किसी भी प्रकार की संविदा सेवाएँ एक निश्चित समय अवधि तक ही बाध्य हो सकती है l
प्राकृतिक न्याय की अवधारण भी यही कहती है आप किसी को जीवन भर अनुबंधित नहीं रख
सकते इसलिए संविदा सेवाएँ एक निश्चित
समय अवधि (जैसे 5 या 10 वर्ष) के बाद स्थायी हो आवश्यक है अगर इसी प्रस्ताव के साथ "धारा 10A: संविदा सेवाओं की स्थायित्व सीमा" (निच्चित समय
अवधि उपरांत ) को जोड़ा जाए तोह भारत के 46 लाख संविदा शासकीय कर्मचारी / अधिकारी के
पैरो से इस कुप्रथा बेडियों को तोडा जा सकता है l
Feb- 2025
🏠 “SHANKRAJ” BHUVAN GUNA (MP) INDIA
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